The 10 ganas or classes of verbs in Bhaja Govindam

भज गोविन्द श्लोकेषु स्थितानां धातो: गणविवरणम्

The verb i.e., तिङन्तपदम् is arrived at based on the root, the specific gana and the specific lakaara.

तिङन्तपदम् = धातु: + <गणविकरणम् for the root’s gana> + <प्रत्यय: for the lakaara>

i.e., पठ् + अ (for भ्वादिगण:) + तिप् (for  लट् लकार: — प् is elided as it get the इत् संज्ञा) –> पठति |

There are 10 ganas of dhaatus.

गणविकरणम्

गण: गणविकरणम् उदाहरणम्
1 भ्वादि (कर्तरि शप्) “भू सत्तायाम्”, “एध” – are the roots. पठ् + अ + ति = पठति
2 अदादि (कर्तरि शप्) अस् + अ + ति is not असति | It is अस्ति due to the लोप: by the sutra अदिप्रभृतिभ्य: शप: | लृक् छन्दसि बहुलम् – in the Vedas, it could come differently.
3 जुहोत्यादि (कर्तरि शप्) दा  दा + अ + ति | जुहोत्यादिभ्य: श्लु: | This means that the अ goes out and the letter doubles (द्वित्वम्) itself in ददाति | भी –> बिभेति | जु –> जुहोति | Due to a different sutra, the jaa changes to ha. The पूर्व letter is called अभ्यास: |  This kind of repetition is referred to as पूर्वोभ्यास: |
4 दिवादि श्यन् –> य नृत् –> नृत् + य + ति = नृत्यति
5 स्वादि श्नु:–> नु शक् –> शक् + नु + ति = शक्नोति
6 तुदादि श –> अ लिख् –> लिख् + अ + ति = लिखति
7 रुधादि श्नम् –> न छिद् –> छिद् + न (before the last consonant) + ति = छिनत्ति
8 तनादि उ –> उ कृ –> करोति = कृ + उ + ति | तन् –> तनोति | कुरुते | तनुते |
9 क्रयादि श्ना –> ना क्रीणाति = क्री + ना + ति | ज्ञा –> जानाति
10 चुरादि (कर्तरि शप्) चोरयति = चुर् + णिच्+ शप् + ति | “… …चुरादिभ्यो निच्” |

 

 

दश-गणा: = भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्रयादि, चुरादि

 

धातु अर्थनिर्देशः पद इट् गण: प्र.पु. लट्
वस् वस निवासे उभय सेट् 1-भ्वा वसति-ते
अस् अस भुवि पर सेट् 2-अ अस्ति
या या प्रापणे पर अनिट् 2-अ याति
विद् विद ज्ञाने पर सेट् 2-अ वेत्ति
इण् गतौ पर अनिट् 2-अ एति
हन् हन हिंसागत्योः पर अनिट् 2-अ हन्ति
वस् वस आच्छादने आत्म सेट् 2-अ वस्ते
पा पा रक्षणे पर अनिट् 2-अ पाति
शी शीङ् स्वप्ने आत्म सेट् 2-अ शेते
दा डुदाञ् दाने उभय अनिट् 3-जु ददाति-दत्ते
हा ओहाक् त्यागे पर अनिट् 3-जु जहाति
गा गा स्तुतौ पर अनिट् 3-जु जिगाति
जन् जन जनने पर सेट् 3-जु जजन्ति
धा धाञ् धारणपोषणयोः उभय अनिट् 3-जु दधाति-धत्ते
मन् मन ज्ञाने आत्म अनिट् 4-दि मानयते
कुप् कुप क्रोधे पर सेट् 4-दि कुप्यति
आप् आपॢ व्याप्तौ पर अनिट् 5-स्वा आप्नोति
हि हि गतौ वृद्धौ च पर अनिट् 5-स्वा हिनोति
मुच् मुचॢ मोक्षणे उभय अनिट् 6-तु मुञ्चति-ते
विश् विश प्रवेशने पर अनिट् 6-तु विशति
शुष् शुष शोषणे पर अनिट् 6-तु शुष्यति
सृज् सृज विसर्गे पर अनिट् 6-तु सृजति
विद् विदॢ लाभे उभय सेट् 6-तु विन्दति-ते
नुद् णुद प्रेरणे उभय अनिट् 6-तु नुदति-ते
प्रछ् प्रछ ज्ञीप्सायाम् पर अनिट् 6-तु पृच्छति
कृ डुकृञ् करणे उभय अनिट् 8-त करोति-कुरुते
ज्ञा ज्ञा अवबोधने पर अनिट् 9-क्र्या जानाति
ग्रह् ग्रह उपादाने उभय सेट् 9-क्र्या गृह्णाति-गृह्णीते
मॄ मॄ हिंसायाम् पर सेट् 9-क्र्या मृणाति
पाल् पाल रक्षणे उभय सेट् 10-चु पालयति-ते
चिन्त् चिति स्मृत्याम् उभय सेट् 10-चु चिन्तयति-ते
ग्रस ग्रस ग्रहणे उभय सेट् 10-चु ग्रासयति-ते
वृज् वृजी वर्जने उभय सेट् 10-चु वर्जयति-ते
भू भू अवकल्कने उभय सेट् 10-चु भावयति-ते
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List of Verbs in Bhaja Govindam

भज गोविन्दम् श्लोकेभ्य: धातो: आवली:

दश-गणा: = भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्रयादि, चुरादि

<धातु> :: <अर्थनिर्देशः> :: <पदः>  :: <इट्> :: <गण:>

  1. अर्ज् :: अर्ज अर्जने :: पर :: सेट् :: भ्वा
  2. अस् :: अस भुवि :: पर :: सेट् :: अ
  3. आप् :: आपॢ व्याप्तौ :: पर :: अनिट् :: स्वा
  4. इ :: इण् गतौ :: पर :: अनिट् :: अ
  5. कुप् :: कुप क्रोधे :: पर :: सेट् :: दि
  6. कृ :: डुकृञ् करणे :: उभय :: अनिट् :: त
  7. क्रीड् :: क्रीडृ विहारे :: पर :: सेट् :: भ्वा
  8. क्षि :: क्षि क्षये :: पर :: अनिट् :: भ्वा
  9. गम् :: गमॢ गतौ :: पर :: अनिट् :: भ्वा
  10. गा :: गा स्तुतौ :: पर :: अनिट् :: जु
  11. ग्रस :: ग्रस ग्रहणे :: उभय :: सेट् :: चु
  12. ग्रह् :: ग्रह उपादाने :: उभय :: सेट् :: क्र्या
  13. चर् :: चर गतौ :: पर :: सेट् :: भ्वा
  14. चिन्त् :: चिति स्मृत्याम् :: उभय :: सेट् :: चु
  15. जन् :: जन जनने :: पर :: सेट् :: जु
  16. जम् :: जमु अदने :: पर :: सेट् :: भ्वा
  17. जीव् :: जीव प्राणधारणे :: पर :: सेट् :: भ्वा
  18. ज्ञा :: ज्ञा अवबोधने :: पर :: अनिट् :: क्र्या
  19. तॄ :: तॄ प्लवनतरणयोः :: पर :: सेट् :: भ्वा
  20. त्यज् :: त्यज हानौ :: पर :: अनिट् :: भ्वा
  21. दंश् :: दंश दशने :: पर :: अनिट् :: भ्वा
  22. दा :: डुदाञ् दाने :: उभय :: अनिट् :: जु
  23. दृश् :: दृशिर् प्रेक्षणे :: पर :: अनिट् :: भ्वा
  24. धा :: धाञ् धारणपोषणयोः :: उभय :: अनिट् :: जु
  25. ध्यै :: ध्यै चिन्तायाम् :: पर :: अनिट् :: भ्वा
  26. नन्द् :: टुनदि समृद्धौ :: पर :: सेट् :: भ्वा
  27. नी :: णीञ् प्रापणे :: उभय :: अनिट् :: भ्वा
  28. नुद् :: णुद प्रेरणे :: उभय :: अनिट् :: तु
  29. पच् :: डुपचष् पाके :: उभय :: अनिट् :: भ्वा
  30. पल् :: पल गतौ :: पर :: सेट् :: भ्वा
  31. पा :: पा पाने :: पर :: अनिट् :: भ्वा
  32. पा :: पा रक्षणे :: पर :: अनिट् :: अ
  33. पाल् :: पाल रक्षणे :: उभय :: सेट् :: चु
  34. पू :: पूङ् पवने :: आत्म :: सेट् :: भ्वा
  35. प्रछ् :: प्रछ ज्ञीप्सायाम् :: पर :: अनिट् :: तु
  36. बुध् :: बुध अवगमने :: पर :: सेट् :: भ्वा
  37. भज् :: भज सेवायाम् :: उभय :: अनिट् :: भ्वा
  38. भू :: भू सत्तायाम् :: पर :: सेट् :: भ्वा
  39. भू :: भू अवकल्कने :: उभय :: सेट् :: चु
  40. मन् :: मन ज्ञाने :: आत्म :: अनिट् :: दि
  41. मुच् :: मुचॢ मोक्षणे :: उभय :: अनिट् :: तु
  42. मॄ :: मॄ हिंसायाम् :: पर :: सेट् :: क्र्या
  43. या :: या प्रापणे :: पर :: अनिट् :: अ
  44. रक्ष् :: रक्ष पालने :: पर :: सेट् :: भ्वा
  45. रम् :: रमु क्रीडायाम् :: आत्म :: अनिट् :: भ्वा
  46. लभ् :: डुलभष् प्राप्तौ :: आत्म :: अनिट् :: भ्वा
  47. वस् :: वस निवासे :: उभय :: सेट् :: भ्वा
  48. वस् :: वस आच्छादने :: आत्म :: सेट् :: अ
  49. वाञ्छ् :: वाछि इच्छायाम् :: पर :: सेट् :: भ्वा
  50. विद् :: विद ज्ञाने :: पर :: सेट् :: अ
  51. विद् :: विदॢ लाभे :: उभय :: सेट् :: तु
  52. विश् :: विश प्रवेशने :: पर :: अनिट् :: तु
  53. वृज् :: वृजी वर्जने :: उभय :: सेट् :: चु
  54. शी :: शीङ् स्वप्ने :: आत्म :: सेट् :: अ
  55. शुष् :: शुष शोषणे :: पर :: अनिट् :: तु
  56. सञ्ज् :: षञ्ज सङ्गे :: पर :: अनिट् :: भ्वा
  57. सृज् :: सृज विसर्गे :: पर :: अनिट् :: तु
  58. हन् :: हन हिंसागत्योः :: पर :: अनिट् :: अ
  59. हा :: ओहाक् त्यागे :: पर :: अनिट् :: जु
  60. हि :: हि गतौ वृद्धौ च :: पर :: अनिट् :: स्वा
  61. हृ :: हृञ् हरणे :: उभय :: अनिट् :: भ्वा

Set, vet and anit classifications in Bhaja Govindam

Patterns of inflections – Set, Vet and Anit classifications in Bhaja Govindam

भज गोविन्द श्लोकेषु – सेट् अनिट् वेट् |

Verbs are classified into सेट्, अनिट् and वेट् based on whether there is इ-आगम: i.e., इडागमः | For example, consider the root भज | Its तुमुन् form is भजितुम् | We notice that it is भज् + इ + तुम् | This inclusion of इ is called इडागमः | If a धातु gets इडागमः, then it is a सेट् (स + इट्) धातु. If a धातु does not get इडागमः, then it is अनिट् (अन् + इट्). Where इडागमः  is optional, it is वेट् (वा + इट्).

Here are some examples from Bhaja Govindam !

  • <धातु> :: <अर्थनिर्देशः> :: <इट्> :: <तुमुनन्त:> :: <आदेशः>
  • ज्ञा :: ज्ञा अवबोधने :: अनिट् :: ज्ञातुम् :: आ –> आदेशः न
  • क्षि :: क्षि क्षये :: अनिट् :: क्षेतुम् :: इ –> ए
  • नी :: णीञ् प्रापणे :: अनिट् :: नेतुम् :: ई –> ए
  • कृ :: डुकृञ् करणे :: अनिट् :: कर्तुम् :: ऋ –> अर्
  • ध्यै :: ध्यै चिन्तायाम् :: अनिट् :: ध्यातुम्  :: ऐ –> आ
  • आप् :: आपॢ व्याप्तौ :: अनिट् :: आप्तुम् :: अस्मिन् हलन्ते –> आदेशः न
  • दृश् :: दृशिर् प्रेक्षणे :: अनिट् :: द्रष्टुम् :: अस्मिन् हलन्ते –> अन्य आदेशः
  • मुच् :: मुचॢ मोक्षणे :: अनिट् :: मोक्तुम्  :: उपान्त्य-ह्रस्व-स्वरस्य गुणः उ –> ओ
  • भू :: भू सत्तायाम् :: सेट् :: भवितुम् :: ऊ –> ऊ+इ
  • तॄ :: तॄ प्लवनतरणयोः :: सेट् :: तरितुम् / तरीतुम् :: ॠ –> इ / ई
  • पाल् :: पाल रक्षणे :: सेट् :: पालयितुम् :: (चुरादी गण:) –> इ
  • क्रीड् :: क्रीडृ विहारे :: सेट् :: क्रीडितुम् :: अस्मिन् हलन्ते –> इ
  • अस् :: अस भुवि :: सेट् :: भवितुम् :: अस्मिन् हलन्ते –> इ  (अस् –> भव्)
  • बुध् :: बुध अवगमने :: सेट् :: बोधितुम् :: अस्मिन् हलन्ते –> इ | उपान्त्य-ह्रस्व-स्वरस्य गुणः उ –>  ओ
  • विद् :: विद ज्ञाने :: सेट् :: वेदितुम् :: अस्मिन् हलन्ते –> इ | उपान्त्य-ह्रस्व-स्वरस्य गुणः इ –> ए

References:

  1. https://grammarofsanskrit.wordpress.com/category/कथं-भवन्ति-पदानि/तुमन्तसिद्धिः/तुमन्तसिद्धिः-३/
  2. List of all verbs in Bhaja Govindam (link to be provided)

Grammatical aspects in Bhaja Govindam verse 31 – Gurucharanaambuja nirbharabhaktah

31. गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्तः – “भज गोविन्दम्” श्लोके स्थिता: केचित् व्याकरणविषयाः

श्लोक:

गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्तः

संसारादचिराद्भव मुक्तः ।

सेन्द्रियमानसनियमादेवं

द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम् ।। ३१ ।।

पदच्छेद:

गुरु+चरण+अम्बुज+निर्भर+भक्तः संसारात् अचिरात् भव मुक्तः सेन्द्रिय+मानस+नियमात् एवं द्रक्ष्यसि निज+हृदयस्थं देवम् |

पदपरिचय:

  • प्रथमवाक्यम्
    • क्रियापदम् =भव [भू “भू सत्तायाम्” पर. लोट्. मपु. एक. ]
    • क्रियाविशेषणम् =अचिरात् [ अव्ययम् ]
    • कर्तृ-विशेषण-सूचक-पदम् = मुक्तः [ अ. पुं. प्र. एक. ]
    • कर्तृपदम् = (त्वम्)
    • कर्तृविशेषणम् = गुरु+चरण+अम्बुज+निर्भर+भक्तः [ अ. पुं. प्र. एक. ]
    • अपादानपदम् = संसारात् [ अ. पुं. प. एक. ]
    • कारणवाचकपदम् = सेन्द्रिय+मानस+नियमात् [ अ. पुं. प. एक. ]
  • द्वितीयवाक्यम्
    • क्रियापदम् = द्रक्ष्यसि [ दृश् “दृशिर् प्रेक्षणे” पर. लिट्. मपु. एक. ]
    • क्रियाविशेषणम् = एवम् [ अव्ययम् ]
    • कर्मपदम् = देवम् [ अ. पुं. द्वि. एक. ]
    • कर्मविशेषणम् = निज+हृदयस्थम् [ अ. पुं. द्वि. एक. ]
    • कर्तृपदम् = (त्वम्)

अन्वय:

गुरु+चरण+अम्बुज+निर्भर+भक्तः (त्वं) सेन्द्रिय+मानस+नियमात् संसारात् अचिरात् मुक्तः भव | एवं (त्वं) निज+हृदयस्थं देवं द्रक्ष्यसि |

सार:

गुरो: पादाम्बुजे अव्याजदृढभक्तियुक्त: जितेन्द्रिय: नियतचित्तश्च सन् अचिरात् जनिमृतिरूपात् संसारात् मुक्तो भव | एवं जीवन्मुक्त: चेत् हृदयस्थितं परमात्मानं द्रक्ष्यसि |

व्याकरणम्

  • सन्धि:
    • संसारादचिरात् = संसारात् + अचिरात्
    • अचिराद्भव = अचिरात् + भव
    • सेन्द्रियमानसनियमादेवम् = सेन्द्रियमानसनियमात् + एवम्
  • विग्रह:
    • गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्तः
      • निर्भरभक्तः – निर्भरा भक्ति: यस्य स: – बहुव्रीहि: |
      • गुरुचरणाम्बुजम् – गुरुचरणमेव अम्बुजम् – अवधारणा-पूर्वपद-कर्मधारय: |
      • गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्तः – गुरुचरणाम्बुजे निर्भरभक्तः – सप्तमितत्पुरुष: |
    • सेन्द्रियमानसनियमात्
      • सेन्द्रियमानसम् – इन्द्रियेण सहितं मानसम् | (स + इन्द्रिय = सेन्द्रिय – वृद्धिसन्धि: )
      • सेन्द्रियमानसनियम: – सेन्द्रियमानसस्य नियम: – षष्ठीतत्पुरुष: |
      • सेन्द्रियमानसनियमात् – तस्मात् |
    • निजहृदयस्थम्
      • निजहृदयम् – निजं हृदयम् |
      • निजहृदयस्थ: – निजहृदये तिष्ठतीति |
      • निजहृदयस्थम् – तम् |

Gurucaraṇāmbujanirbharabhaktaḥ
sansārādacirādbhava muktaḥ |
sēndriyamānasaniyamādēvaṁ
drakṣyasi nijahr̥dayasthaṁ dēvam || 31 ||

With increasing devotion surrender thyself at the feet of thy Guru (the Lord). Thou attain salvation, relieved from the bondages of the world. Thou perceive the Lord in thy heart when thou bring under control thy body and mind. Thus thou cut down the tree of transmigration.

Grammatical aspects in Bhaja Govindam verse 30 – Praanaayaamam pratyaahaaram

30. प्राणायामं प्रत्याहारम् – “भज गोविन्दम्” श्लोके स्थिता: केचित् व्याकरणविषयाः

 श्लोक:

प्राणायामं प्रत्याहारं

नित्यानित्यविवेकविचारम् ।

जाप्यसमेतसमाधिविधानं

कुर्ववधानं महदवधानम् ।। ३० ।।

पदच्छेद:

प्राणायामं प्रत्याहारं नित्य+अनित्य+विवेक+विचारम् जाप्य+समेत+समाधि+विधानं

कुरु अवधानं महत् अवधानम् |

पदपरिचय:

  • प्रथमवाक्यम्
    • क्रियापदम् = कुरु [ कृ “डुकृञ् करणे” उभ. लोट्. मपु. एक. ]
    • क्रियाविशेषणम् =अवधानम् [ अ. नपुं. द्वि. एक. ]
    • कर्मपदम् = प्राणायामम् [ अ. पुं. द्वि. एक. ]
    • कर्मपदम् = प्रत्याहारम् [ अ. पुं. द्वि. एक. ]
    • कर्मपदम् = नित्य+अनित्य+विवेक+विचारम् [ अ. पुं. द्वि. एक. ]
    • कर्मपदम् = जाप्य+समेत+समाधि+विधानम् [ अ. नपुं. द्वि. एक. ]
    • कर्तृपदम् = (त्वम्)
  • द्वितीयवाक्यम्
    • क्रियापदम् = (कुरु)
    • वाक्यांश:
      • क्रियाविशेषणम् =अवधानम् [ अ. नपुं. द्वि. एक. ]
      • क्रियाविशेषण-विशेषणम् =महत् [ अ. नपुं. द्वि. एक. ]
    • कर्तृपदम् = (त्वम्)

अन्वय:

प्राणायामं प्रत्याहारं नित्य+अनित्य+विवेक+विचारम् जाप्य+समेत+समाधि+विधानं

अवधानं कुरु | महत् अवधानं (कुरु) |

सार:

प्राणायाम: इन्द्रियनिग्रह: नित्यानित्यवस्तुविवेक: जपसहितसमाधि: श्रद्धा च अतीव श्रद्धया त्वया कार्या: | प्राणायाम-प्रत्याहारौ योगङ्गत्वेन निर्दिष्टौ |

व्याकरणम्

  • सन्धि:
    • कुर्ववधानम् = कुरु अवधानम् – यण् सन्धि: |
    • महदवधानम् = महत् अवधानम् – जश्त्वसन्धि: |
  • समास:
    • जाप्यसमेतसमाधिविधानम्
      • जाप्यम् – जपसंबन्धौ आचरणम् |
      • समाधिविधानम् – समाधे: विधानम् |
      • जाप्यसमेतसमाधिविधानम् – जाप्येन समेतं समाधिविधानम् | तत्

Prāṇāyāmaṁ pratyāhāraṁ
nityānityavivēkavicāram |
jāpyasamētasamādhividhānaṁ
kurvavadhānaṁ mahadavadhānam || 30 ||

Thou hast discharged the duty of thy existence in this world if thou attain the very difficult state of (samaadi) tranquility, controlling the breath and food and cognizing the real from the unreal.

Grammatical aspects in Bhaja Govindam verse 29 – Arthamanartham bhaavaya nityam

29. अर्थमनर्थं भावय नित्यम् – “भज गोविन्दम्” श्लोके स्थिता: केचित् व्याकरणविषयाः

 श्लोक:

अर्थमनर्थं भावय नित्यं

नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम् |

पुत्रादपि धनभाजां भीतिः

सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ।।२९।।

पदच्छेद:

अर्थं अनर्थं भावय नित्यं न अस्ति ततः सुख+लेशः सत्यं पुत्रात् अपि धन+भाजां भीतिः सर्वत्र एषा विहिता रीतिः ।

पदपरिचय:

  • प्रथमवाक्यम्
    • क्रियापदम् =भावय [ भू “भू सत्तायाम्” + णिजन्त: पर. लोट्. मपु. एक. ]
    • क्रियाविशेषणम् =नित्यम् [ अव्ययम् ]
    • कर्मविशेषण-सूचक-पदम् = अनर्थम् [ अ. पु. द्वि. एक. ]
    • कर्मपदम् =अर्थम् [ अ. पु. द्वि. एक. ]
    • कर्तृपदम् = (तवम्)
  • द्वितीयवाक्यम्
    • कर्तृपदम् = सत्यम् [ अ. नपुं. प्र. एक. ]
    • कर्म-वाक्यम्
      • क्रियापदम् = अस्ति [ अस् “अस भुवि” पर. लट्. प्रपु. एक. ]
      • क्रियाविशेषणम् = न [ अव्ययम् ]
      • कर्तृपदम् = सुख+लेशः [ अ. पुं. प्र. एक. ]
      • अपादानपदम् = ततः [ अव्ययम् ]
    • सम्योजकपदम् = (इति)

तृतीयवाक्यम्

  • वाक्यांश:
    • कर्तृपदम् = भीतिः [ इ. स्त्री. प्र. एक. ]
    • सम्बन्ध-विशेषण-पदम् = धन+भाजां [ अ. पुं. ष. बहु. ]
  • अपादानपदम् = पुत्रात् [ अ. पुं. प. एक. ]
  • अपादानविशेषणम् = अपि [ अव्ययम् ]
  • चतुर्थवाक्यम्
    • कर्तृ-विशेषण-सूचक-वाक्यांश:
      • कर्तृपदम् =रीतिः [ इ. स्त्री. प्र. एक. ]
      • कर्तृविशेषणम् =विहिता [ आ. स्त्री. प्र. एक. ]
    • कर्तृपदम् =एषा [ एतद् द. स्त्री. प्र. एक. ]
    • स्थानवाचकपदम् = सर्वत्र [ अव्ययम् ]

अन्वय:

अर्थं अनर्थं नित्यं भावय | ततः सुख+लेशः न  अस्ति (इति) सत्यम् | पुत्रात् अपि धन+भाजां भीतिः (भवति) | सर्वत्र एषा विहिता रीतिः (भवति) ।

सार:

अर्थं अनर्थस्य कारणं भवति | तत: सुखलेशोऽपि न लभ्यत इत्येव सत्यम् | धनभाजां स्वपुत्रादपि भीति: वर्त्तते | सर्वत्र एषा रीति: विहिता | ईदृशी रीति: लोके दृष्टा इत्यर्थ: |

व्याकरणम्

  • सन्धि:
    • नास्ति = न + अस्ति – सवर्णदीर्घसन्धि: |
    • पुत्रादपि = पुत्रात् + अपि – जश्त्वसन्धि: |
    • सर्वत्रैषा = सर्वत्र + एषा – गुणसन्धि: |
  • विग्रह:
    • सुख+लेशः = सुखस्य लेश: सुखलेश: – षष्ठीतत्पुरुष: |
    • धन+भाजाम् = धनं भजन्ति इति धनभाज: | तेषाम् |

Arthamanarthaṁ bhāvaya nityaṁ
nāsti tataḥ sukhalēśaḥ satyam |
putrādapi dhanabhājāṁ bhītiḥ
sarvatraiṣā vihitā rītiḥ || 29 ||

Be assured that wealth is a source of danger. There is not a bit of real happiness. Even the son is suspected by one who possesses wealth. He is ever in a state of terror. There is no exception to this state of affairs.

Grammatical aspects in Bhaja Govindam verse 28 – Sukhatah kriyate raamaabhogah

28. सुखतः क्रियते रामाभोगः – “भज गोविन्दम्” श्लोके स्थिता: केचित् व्याकरणविषयाः

श्लोक:

सुखतः क्रियते रामाभोगः

पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः |

यद्यपि लोके मरणं शरणं

तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ।। २८ ।।

पदच्छेद:

सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चात् हन्त शरीरे रोगः यद्यपि लोके मरणं शरणं

तत् अपि न मुञ्चति पाप+आचरणम् |

पदपरिचय:

  • प्रथमवाक्यम्
    • (कर्मणि) क्रियापदम् = क्रियते [ कृ “डुकृञ् करणे” उभ. कर्मणि लट्. प्रपु. एक. ]
    • क्रियाविशेषणम् =सुखतः [ अव्ययम् ]
    • (कर्मणि) कर्मपदम् =रामाभोगः [ अ. पुं. प्र. एक. ]
  • द्वितीयवाक्यम्
    • उद्घोषणपदम् = हन्त [ अव्ययम् ]
    • क्रियापदम् = (भवति)
    • कर्तृपदम् =रोगः [ अ. पुं. प्र. एक. ]
    • कालवाचकपदम् = पश्चात् [ अव्ययम् ]
    • अधिकरणपदम् = शरीरे [ अ. पुं. स. एक. ]
  • तृतीयवाक्यम्
    • “यद्यपि” वाक्यांश:
      • क्रियापदम् =(भवति)
      • कर्तृ-विशेषण-सूचक-पदम् = शरणम् [ अ. नपुं. प्र. एक. ]
      • कर्तृपदम् =मरणम् [ अ. नपुं. प्र. एक. ]
      • अधिकरणपदम् = लोके [ अ. पुं. स. एक. ]
      • सम्योजकपदम् = यद्यपि [ अव्ययम् ]
    • “तत्” वाक्यांश:
      • क्रियापदम् =मुञ्चति [ मुच् “मुच्ऌ मोक्षणे” उभ. लट्. प्रपु. एक. ]
      • क्रियाविशेषणम् = न [ अव्ययम् ]
      • कर्तृपदम् =पाप+आचरणम् [ अ. नपुं. प्र. एक. ]
      • सम्योजकपदम् = तत् [ तद् द. नपुं. प्र. एक. ]
      • सम्योजकपदम् = अपि [ अव्ययम् ]

अन्वय:

सुखतः रामाभोगः क्रियते | हो हन्त ! पश्चात् शरीरे रोगः (भवति) | यद्यपि लोके मरणं शरणं, तत् अपि पाप+आचरणं न मुञ्चति |

सार:

जन: सुखार्थं स्त्रीभोगादिविषयेषु व्यापृतो वर्तते भोगे च कृते क्रमेण शरीरं विविधव्याधिना आक्रान्तं भवति | यद्यपि लोके मरणं शरणं तदापि नैमिषिक सुखाय मूढो लोक: पापकर्मम् अनवरतं करोत्येव |

व्याकरणम्

  • विग्रह:
    • रामाभोग: = रामाया: आभोग: – षष्ठीतत्पुरुष: |
    • शरीरे = शीर्यते इति शरीरम् | तस्मिन् |
    • पापाचरणम् = पापस्य आचरणम् – षष्ठीतत्पुरुष: |

Sukhataḥ kriyatē rāmābhōgaḥ
paścād’dhanta śarīrē rōgaḥ |
yadyapi lōkē maraṇaṁ śaraṇaṁ
tadapi na muñcati pāpācaraṇam || 28 ||

Thou enjoy all conjugal pleasures so long as thou art strong and when thou attain old age thou art victim to diseases. Death is inevitable unto thee. Being aware of all these thou do not desist from sins.