Neethi Shastram – #3, #4 (Subhashitam)

Here is an extract from the collection of 222 Subhashitams under the heading Neethi Shastra from the hand written notes of Sri. Skanda Narayanan. Sri Skanda Narayanan has also written down the word-to-word meaning in Tamil.

First post – https://nivedita2015.wordpress.com/2015/10/09/neethi-shastram-1-subhashitam/

२१. एकैका गौस्त्रय: सिंहा:

एकैका गौस्त्रय: सिंहा: पञ्च व्याघ्रा: प्रसूतिभि: | अधर्मान्नष्टसन्ताना धर्मात्सन्तानवर्धनी ||

प्रसूतिभि: गौ: एक+एका: (जायते) | प्रसूतिभि: सिंहा: त्रय: (जायन्ते) | व्याघ्रा: पञ्च |  अधर्मात् नष्टसन्ताना: | (परन्तु गौ: तु) धर्मात् सन्तानवर्धनी |

By the deliveries, cows are born one at a time. In a single delivery, three lions and five tigers would be born. But they lose their young ones due to adharma and the cow’s progeny grows due to dharma.

२२. बालार्क: प्रेतधूमश्च

बालार्क: प्रेतधूमश्च वृद्धस्त्री पल्वलोदकम् | रात्रौ दध्यन्नभुक्तिश्च आयु: क्षीणं दिने दिने ||

बाल+अर्क:, प्रेत+धूम:, वृद्ध+स्त्री, पल्वल+उदकम्, रात्रौ दधि+अन्न+भुक्ति: च दिने दिने आयु: क्षीणं (भवति) |

२३. वृद्धार्को होमधूमश्च

वृद्धार्को होमधूमश्च बालस्त्री निर्मलोदकम् | रात्रौ क्षीरान्नभुङ्क्तिश्च आयुर्वृद्धिर्दिनेदिने ||

वृद्ध+अर्क:, होम+धूम:, बाल+स्त्री:, निर्मल+उदकम्, रात्रौ क्षीर+अन्न+भुङ्क्ति:, च आयु: वृद्धि: दिने दिने |

२४. उत्तमं स्वार्जितं वित्तम्

उत्तमं स्वार्जितं वित्तं मध्यमं पितुरार्जितम् | अधमं भ्रातृवित्तं च स्त्रीवित्तमधमाधमम् ||

स्वार्जितं वित्तं उत्तमम् | पितु: आर्जितं मध्यमम् | भ्रातृवित्तम् अधमं | स्त्रीवित्तम् अधमाधमं च |

२५. उत्तमं कुलविद्याया

उत्तमं कुलविद्याया मध्यमं कृषिवाणिजात् | अधमं सेवकावृत्ति: मृतिश्चौर्योपजीवनम् ||

कुलविद्याया: वृत्ति: उत्तमम् | कृषिवाणिजात् वृत्ति: मध्यमम् | सेवकावृत्ति: अधमम् | चौर्योपजीवनं मृति: |

चौर्य+उपजीवनं

२६. उत्तमे च क्षणं कोप:

उत्तमे च क्षणं कोपो मध्यमे घटिकाद्वयम् | अधमे स्यादहोरात्रं पापिष्टे मरणान्तक: ||

उत्तमे कोप: क्षणं | मध्यमे घटिकाद्वयम् | अधमे स्यात् अहोरात्रम् | पापिष्टे मरणान्तक: |

२७. आत्मबुद्धि: सुखञ्चैव

आत्मबुद्धि: सुखञ्चैव गुरुबुद्धिर्विशेषत: | परबुद्धिर्विनाशाय स्त्रीबुद्धि: प्रलयङ्करी ||

आत्मबुद्धि: सुखं च एव | गुरुबुद्धि: विशेषत: | परबुद्धि: विनाशाय | स्त्रीबुद्धि: प्रलयङ्करी |

२८. अतिथौ तिष्टति

अतिथौ तिष्टति द्वारि ह्यपो गृह्णाति यो नर: | आपोशनं सुरापानं अन्नं गोमांसभक्षणम् ||

अतिथौ तिष्टति द्वारि (सति) हि य: नर: अपो  गृह्णात, आपोशनं  सुरापानम् | अन्नं गो+मांस+भक्षणम् |

While keeping the guest waiting at the door, if one drinks water, that water is considered as liquor. The food that the host eats is considered as the meat of the cow.

२९. दर्शनाच्चित्तवैकल्यम्

दर्शनाच्चित्तवैकल्यं स्पर्षनात्तु धनक्षय: | संयोगात्किल्बिषं पण्यस्त्रीणां प्रत्यक्षरक्षसाम् ||

प्रत्यक्षरक्षसाम् पण्यस्त्रीणां दर्शनात् चित्तवैकल्यम् | (तासां) स्पर्षनात् तु धनक्षय: | (तासां) संयोगात् किल्बिषम् |

३०. दासी मानधानं हन्ति

दासी मानधानं हन्ति हन्ति वेश्या धनादिकम् | आयूंषि विधवा हन्ति सर्वं हन्ति पराङ्गना ||

दासी मानधानं हन्ति | वेश्या: धनादिकम् हन्ति | विधवा आयूंषि हन्ति | सर्वं हन्ति पराङ्गना |

३१. न गच्छेत् राजयुग्मम्

न गच्छेत् राजयुग्मं च न गच्छेद्ब्राह्मणत्रयम् | चतुस्शूद्रा न गच्छेयुर्न गच्छेद्वैश्यपञ्चकम् ||

राजयुग्मं न गच्छेत् | ब्राह्मणत्रयं न गच्छेत् च | चतुस्शूद्रा न गच्छेयु: | वैश्यपञ्चकम् न गच्छेत् |

कार्यार्थं कति जना: न गन्तव्यम् इति एतस्मिन् श्लोके उक्तं अस्ति |

३२. उष: शशंस गार्ग्यस्तु

उष: शशंस गार्ग्यस्तु शकुनं तु बृहस्पति: | मनोजयं तु माण्डव्यो विप्रवाक्यो जनार्दन: ||

उष: (काल: उचितं भवति इति) गार्ग्य: तु शशंस | शकुनं (द्रष्टव्यं इति) बृहस्पति: | मनोजयं (पर्याप्तं इति) तु माण्डव्य: | विप्रवाक्य: (अनुसृत्य कुरु इति) जनार्दन: |

शशंस = उक्तवान् | कार्यं कदा करणीयं इति एतस्मिन् श्लोके उक्तं अस्ति |

३३. शर्वरीदीपकश्चन्द्र:

शर्वरीदीपकश्चन्द्र: प्रभातोद्दीपक: रवि: | त्रैलोक्यदीपको धर्म: सुपुत्र: कुलदीपक: ||

शर्वरीदीपक: चन्द्र: | प्रभात+उद्दिपक: रवि: | त्रैलोक्यदीपक: धर्म: | कुलदीपक: सुपुत्र: |

३४. स बन्धुर्यो हितेषु स्यात्स

स बन्धुर्यो हितेषु स्यात्स पिता यस्तु पोषक: | स सखा यत्र विश्वास: सा भार्या यत्र निर्वृति: ||

य: हितेषु स्यात् स: बन्धु: | य: तु पोषक: स: पिता | यत्र विश्वास: स: सखा | यत्र निर्वृति: सा भार्या |

निर्वृति: = सुखम्

३५. अर्थानामार्जने दु:खम्

अर्थानामार्जने दु:खमार्जितानां चरक्षणे | नाशे दु:खं व्यये दु:खं किमर्थं दु:खभाजनम् ||

अर्थानाम् आर्जने दु:खं | आर्जितानां च रक्षणे (दु:खम्) | नाशे दु:खम् | व्यये दु:खम् | किमर्थं दु:खभाजनम् ?

३६. हरिणापि हरेणापि

हरिणापि हरेणापि ब्रह्मणापि सुरैरपि | ललाटलिखिता रेखा परिमार्ष्टुं न शक्यते ||

हरिणा अपि हरेण अपि ब्रह्मणा अपि सुरै: अपि ललाट+लिखिता रेखा परिमार्ष्टुं न शक्यते |

परिमार्ष्टुम् = मार्जयितुम्

३७. घृतेन वर्धते बुद्धि:

घृतेन वर्धते बुद्धि: क्षीरेण आयुष्यवर्धनम् | शाकेन वर्धते व्याधि: मांसं मांसेन वर्धते ||

घृतेन बुद्धि: वर्धते | क्षीरेण आयुष्यवर्धनम् | शाकेन व्याधि: वर्धते | मांसेन मांसं वर्धते |

३८. उत्साह: साहसं धैर्यम्

उत्साह: साहसं धैर्यं बुद्धि: शक्ति: पराक्रम: | षडेते यत्र तिष्ठन्ति तत्र देवोऽपि तिष्ठति ||

उत्साह:, साहसं, धैर्यं, बुद्धि:, शक्ति:, पराक्रम: (च) एते षड् यत्र तिष्ठन्ति तत्र देव: अपि तिष्ठति |

३९. असन्तुष्टो द्विजो नष्ट:

असन्तुष्टो द्विजो नष्ट: संतुष्टश्चैव पार्थिव: | सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जा च कुलाङ्गना ||

असन्तुष्ट: द्विज: नष्ट: | संतुष्ट: पार्थिव: च नष्ट: एव | सलज्जा गणिका नष्टा | निर्लज्जा कुलाङ्गना च नष्टा |

पार्थिव: = क्षत्रिय: | गणिका = वेश्यस्त्री |

४०. वेदमूलमिदं ब्रह्मम्

वेदमूलमिदं ब्रह्मं भार्यामूलमिदं गृहम् | कृषिमूलमिदं धान्यं धनमूलमिदं जगत् ||

वेदमूलम् इदं ब्रह्मम् | भार्यामूलम् इदं गृहम् | कृषिमूलम् इदं धान्यम् | धनमूलम् इदं जगत् |

ब्रह्मम् = विप्र: |

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